कार्यक्रम की रूपरेखा
विकसित पंचायत पहल के लिए क्षमता का विकास करना क्षमता विकास आयोग (सीबीसी) का एक प्रायोगिक कार्यक्रम है जिसकी संकल्पना मिशन कर्मयोगी के सिद्धांतों पर विकेंद्रीकृत प्रशासन की बुनियाद के रूप में पंचायती राज संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए की गई है। इस कार्यक्रम की रूपरेखा निर्वाचित प्रतिनिधियों और पंचायत स्तरीय अधिकारियों दोनों की क्षमताएं विकसित करने के लिए तैयार की गई है जिससे वे अपने संवैधानिक और सांविधिक उत्तरदायित्वों का दक्षतापूर्वक निर्वहन कर सकें।
यद्यपि पंचायतों को 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा सशक्त बनाया गया है फिर भी जमीनी स्तर पर क्षमता में निरंतर अंतर बने रहने के कारण कारगर योजना बनाने, वित्तीय प्रबंधन करने, सेवा देने और नागरिक जुड़ाव में अवरोध उत्पन्न होते रहते हैं। विकसित पंचायत पहल सक्षमता आधारित दृष्टिकोण अपनाकर इस चुनौती का सामना करती प्रतीत होती है क्योंकि पंचायत पदाधिकारियों से जो अपेक्षाएं हैं, इन भूमिकाओं के निर्वहन के लिए जिन सक्षमताओं की आवश्यकता होती है और उनकी सहायता के लिए जिन व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है यह उन पर फोकस करती है।
इस कार्यक्रम की अभिकल्पना एक प्रायोगिक प्रयास के रूप में की गई है जिसका कार्यान्वयन चार राज्यों – असम, ओडिशा, गुजरात और आंध्र प्रदेश की लगभग 60 ग्राम पंचायतों में किया जाना है। इस प्रायोगिक कार्यक्रम के तहत एक साझा डिजाइन फ्रेमवर्क बनाए रखते हुए स्थिति अनुसार अंगीकरण किया जाना है जिसमें आयोग को प्रमाण देने होंगे, प्रणालियों को सुधारना होगा और ऐसे मॉडल विकसित करने होंगे जो कार्यान्वयन और विस्तार योग्य हों। इसका दूरगामी उद्देश्य पीआरआई संस्थाओं के लिए पंचायती राज मंत्रालय की भागीदारी में राष्ट्र स्तरीय रणनीतियां बनाना है।
कार्यक्रम के उद्देश्य
विकसित पंचायत पहल का प्राथमिक उद्देश्य पंचायत के स्तर पर सक्षमता के अंतर को दूर करना और पीआरआई की संस्थागत कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करना है। इस कार्यक्रम में पंचायत प्रतिनिधियों और अधिकारियों की निम्नानुसार योग्यता बढ़ाना है:
- स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकास कार्यों की योजना बनाना और उन्हें कार्यान्वित करना।
- वित्तीय संसाधनों का कारगर ढंग से और स्थापित मानदंडों का अनुपालन करते हुए प्रबंध करना।
- सार्वजनिक सेवाएं और हकदारियां दक्षतापूर्वक देना।
- स्थानीय स्तर पर जवाबदेही और पारदर्शिता व्यवस्था को सुदृढ़ करना।
प्रमाण आधारित अनुमापीय मॉडल
इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी है कि ऐसे प्रमाण-आधारित, अनुमापीय क्षमता-विकास मॉडल विकसित किए जाएं कि राज्यों और संस्थाओं द्वारा उन्हें अपनाया जा सके। प्रक्रियाओं, परिणामों और कार्यान्वयन में मिली सीख को लिपिबद्ध किया जाए जिससे इस कार्यक्रम के द्वारा पंचायत क्षमता विकास पर राष्ट्रीय वार्ताओं में योगदान करके भावी नीति एवं कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की जा सके।
पद्धति अंगीकृत
इस कार्यक्रम में सक्षमता-आधारित और सहभाग्य पद्धति का अनुपालन किया जाता है जिसमें अनुसंधान, हितधारक संबद्धता, अनुभवजन्य प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी-समर्थ सहायता को शामिल किया जाता है।
सक्षमता आधारित फ्रेमवर्क
इस कार्यक्रम की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें पंचायत के प्रमुख पदाधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों तथा पदधारियों की भूमिका-आधारित सक्षमता मैपिंग की जाती है। आयोग विषय विशेषज्ञों, एसआईआरडी और व्यवहारकर्ताओं के साथ कार्य करता है जिससे पंचायत के प्रशासन के दक्षतापूर्वक संचालन के लिए आवाश्यक कार्यपरक, व्यवहारगत और क्षेत्रगत सक्षमताओं का पता लगाया जा सके। इस मैपिंग से आकलन, प्रशिक्षण डिजाइन और निगरानी के लिए आधार मिलता है।
हितधारक परामर्शदाता और प्रशिक्षण आवश्यकताओं का विश्लेषण
राज्य एवं पंचायत स्तरों पर विस्तृत परामर्श किए गए जिनमें पंचायती राज के अधिकृत प्रतिनिधियों, एसआईआरडी, मध्यवर्ती जिलों के जिला कलेक्टरों, पंचायत सचिवों और अन्य हितधारकों के शामिल किया गया। इन परामर्शों से दो उद्देश्यों की पूर्ति हुई: हितधारक जुड़ गए और प्रशिक्षण आवश्यकताओं का विश्लेषण हो पाया। इन चर्चाओं के आधार पर क्षमता-विकास के प्राथमिक विषयों का पता लग पाया जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि कार्यक्रम से पंचायतों की वास्तविक परिचालन चुनौतियों को दूर करने में सहायता मिले।
प्रशिक्षण डिजाइन एवं सेवाप्रदायगी दृष्टिकोण
इस कार्यक्रम में 70:20:10 प्रशिक्षण मॉडल का उपयोग किया जाता है जिसमें अनुभावात्मक प्रशिक्षण (70%) और समान संस्था आधारित प्रशिक्षण (20%) और सुनियोजित स्व-प्रशिक्षण (10%) पर बल रहता है। इस पद्धति को अपनाने से पारंपरिक क्लासरूम-केंद्रित प्रशिक्षण के स्थान पर दैनिक कार्य संदर्भों से मिलने वाली सीख का अधिक लाभ हुआ।
एक प्रशिक्षण डिजाइन कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें प्रौढ़ प्रशिक्षण विशेषज्ञ, अकादमिकों, सिविल सोसाइटी व्यवहारकर्ताओं, राज्य सरकार के पदधारियों और पंचायती राज मंत्रालय के प्रतिनिधियों को साथ लाया गया। इस कार्यशाला में प्राप्त विभिन्न सुझावों के आधार पर 14 प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए गए जिसमें पंचायत स्तरीय प्रशासन से जुड़े प्रमुख सक्षमता क्षेत्रों को शामिल किया गया। इन मॉड्यूलों की कागजी प्रति तैयार की गई और इन्हें डिजिटलीकृत किया जा रहा है और इसके बाद उन प्रतियों को जारी किया जाएगा।
प्रौद्योगिकी समर्थता
इस कार्यक्रम के लिए प्रौद्योगिकी अत्यंत आवश्यक है। प्रशिक्षण की विषयवस्तु और प्रशिक्षण प्रबंधन को iGOT कर्मयोगी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जा रहा है जिससे मिशन कर्मयोगी के डिजिटल प्रशिक्षण-तंत्र का लाभ मिल सके। iGOT से जुड़ जाने से प्रशिक्षण मॉड्यूल की उस पर उपलब्धता, सहभागियों की ट्रैकिंग और प्रशिक्षण-प्रबंधन के कार्यों में सहायता मिल पाएगी।
इसके अलावा, एआई-समर्थ चैटबॉट विकसित किया जा रहा है जिससे पंचायत पदाधिकारियों को मांगे जाने पर विषय विशिष्ट की सहायता उपलब्ध कराई जा सकेगी। चैटबॉट इस तरह से तैयार किया गया है कि भूमिकाओं, सुशासन प्रक्रियाओं, योजनाओं और हकदारियो से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने में समर्थ बनाया गया है। इस प्रकार प्रशिक्षण के औपचारिक सत्रों के बिना भी प्रशिक्षण हो पाएगा। चैटबॉट की बीटा टैस्टिंग पूरी कर ली गई है और यह टूल इस समय विकास के आगे के चरणों में है और यह इस दौरान समय-समय पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर तैयार किया जा रहा है।
मूल्यांकन एवं निगरानी
कार्यक्रम में सुसंरचित मूल्यांकन फ्रेमवर्क शामिल है जिसमें बेसलाइन, मिडलाइन और एंडलाइन आकलन किए गए हैं। एक बेसलाइन सर्वेक्षण मध्यवर्ती पंचायतों में किया गया जिससे वर्तमान सक्षमता स्तरों का मूल्यांकन किया जा सके और संस्थागत जानकारी से संबंधित संकेतक मिल सकें और योजना क्षमताओं, निधि उपयोग प्रणालियों तथा नागरिकों की राय जानी जा सके। यह जानकारी प्रगति का मूल्यांकन करने और कार्यक्रम की अवधि के दौरान इसके प्रभाव को जानने के लिए आवश्यक बैंचमार्क तय करने में सहायक सिद्ध होगी।
कार्यान्वयन-स्थान और भागीदारियां
प्रायोगिक कार्यक्रम चार राज्यों – असम, ओडिशा, गुजरात और आंध्र प्रदेश की लगभग 60 ग्राम पंचायतों में चलाया जा रहा है। राज्य विशिष्ट कार्यान्वयन मॉडलों का उपयोग किया जा रहा है जिससे स्थानीय संस्थागत संदर्भों की जानकारी प्राप्त हो पाए और एक समान कार्यक्रम फ्रेमवर्क इस्तेमाल होता रहे।
राष्ट्रीय एंकर
कैवल्या एज्युकेशन फाउंडेशन (पीरामल) - राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम एकंरिंग
चैटबॉट विकास
टेक4डेव - व्हाट्सऐप आधारित एआई चैटबॉट, वर्तमान में फील्ड टैस्टिंग चल रही है
अनुसंधान में भागीदार
नवग्राम - बेसलाइन और प्रभाव मूल्यांकन
राज्य स्तरीय भागीदार
केईएफ द्वारा ऐसे अनुभवी संगठनों को साथ जोड़ा गया है जिनका प्रत्येक राज्य में जमीनी स्तर पर अच्छी उपस्थिति है। साथ में एसआईआरडी और पंचायत के अधिकृत प्रतिनिधि भी हैं
वर्तमान स्थिति और अद्यतन प्रगति
विगत वर्षों में आयोग का फोकस कार्यक्रम डिजाइन, प्रारंभिक गतिविधियों और शुरुआत के लिए तैयारी करने पर रहा है। प्रमुख उपलब्धियां निम्नानुसार रही हैं:
इन गतिविधियों से सुनिश्चित होता है कि कार्यक्रम कार्यान्वयन चरण में आ गया है जिसके बहुत से प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं, हितधारकों ने भी जिम्मेदारी स्वीकार की है और परिचालन तैयारियां भी हो गई हैं।
प्रभाव मैट्रिक्स
संपन्न कार्य
- विलयित प्रशिक्षण साधनों द्वारा अनेक पीआरआई सदस्य प्रशिक्षित और प्रमाणित
- आवश्यकता अनुरूप अनेक प्रशिक्षण मॉड्यूल सुपुर्द और अंगीकृत
- प्रयोक्ता गतिविधियों और प्रौद्योगिकीय प्लेटफॉर्मों (ऐप, एलएमएस, चैटबॉट) पर प्रतिक्रियाओं की प्राप्ति
- कम्युनिटी इनपुट्स से अनेक जीपीडीपी तैयार और सर्वश्रेष्ठ प्रणालियों के अपनाए जाने के प्रमाण प्राप्त
परिणाम
- पंचायत स्तर पर बेहतर प्रशासन क्षमता, नेतृत्व और नागरिक केंद्रित सेवा प्रदायगी
- योजना बनाने और पब्लिक इंटरफेस के लिए डिजिटल टूल्स का उपयोग करने वाले पीआरआई का उच्चतर अनुपात
- स्थानीय निर्णय लेने में और योजना प्रक्रियाओं में नागिरकों की अधिक सहभागिता
- पंचायतों में वित्तीय एवं संसाधन प्रबंधन प्रणालियों का अधिक अंगीकरण
संकेतक
भविष्य की योजना
यह कार्यक्रम अब चयनित पंचायतों में पूर्ण स्तर पर कार्यान्वयन के लिए तैयार है, निरंतर प्रगति निगरानी, मिडलाइन मूल्यांकन और फील्ड से प्राप्त फीडबैक के आधार पर अंगीकरण परिष्कार चल रहे हैं। भविष्य में उन्नयन के लिए प्रक्रियाओं और परिणामों का प्रलेखन शुरू किया जाएगा। आयोग पंचायती राज मंत्रालय और राज्य सरकारों के साथ जुड़ा रहेगा जिससे राष्ट्रीय और राज्य की प्राथमिकताओं के साथ जुड़ाव सुनिश्चित किया जा सके।
इस प्रायोगिक कार्यक्रम के द्वारा क्षमता-विकास आयोग का लक्ष्य है कि यह दिखाया जाए कि कैसे एक संरचित, सक्षमता आधारित दृष्टिकोण पंचायतों का सुदृढ़ीकरण कर सकता है और प्रशासन एवं स्थानीय विकास को विकेंद्रीकृत करने में सार्थक योगदान कर सकता है।