क्षमता निर्माण आयोग

संस्कृति निर्माण में हमारा योगदान: नेतृत्व के सबक

डॉ. अंजु राठी राणा

सदस्य सचिव, भारतीय विधि आयोग, विधि एवं न्याय मंत्रालय

संस्कृति निर्माण में हमारा योगदान: नेतृत्व के सबक

संस्कृति निर्माण में हमारा योगदान: नेतृत्व के सबक


मिशन कर्मयोगी संकल्पना की सर्वप्रथम जब मुझे जानकारी मिली तब सुधार का विचार मुझे नहीं सूझा। मैंने सुशासन को मन ही मन सेवा-कार्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का एक अवसर माना। मैंने इसे सम्मान या पुरस्कार प्राप्त करने का साधन नहीं समझा बल्कि अपने कार्य को निष्ठापूर्वक निष्पादित करने से मिलने वाली सर्वोच्च संतुष्टि के रूप में स्वीकार किया।

इस मिशन का ध्येय वास्तव में इस परिवर्तनकारी सत्य से साक्षात्कार कराना है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था का सामर्थ्य उसके नियम नहीं बल्कि उसके कार्मिक हैं। क्षमता विकास को मैंने कभी कार्यालयीन कार्य की पूर्ति मात्र नहीं माना बल्कि संस्कृति विकास का एक परम अवसर माना। मैं एक ऐसा कार्य-स्थल बनाना चाहती हूँ जिसमें सीखना उतना ही स्वाभाविक है जितना बात करना। लंच टेबल पर एक दूसरे से मिलने के लिए हम जैसे उत्सुक रहते हैं वैसे ही एक दूसरे से सीखते भी हैं। प्रत्येक भूमिका, प्रत्येक सुधार के प्रति जिज्ञासा; जन सेवा और विकसित भारत@2047 के बृहत् उद्देश्य की प्राप्ति के लिए होनी चाहिए।

“हम प्राय: प्रयास करने से पहले पुरस्कार चाहते हैं और हमारी सोच यही रहती है कि ’मुझे क्या मिलेगा?’ परंतु यह सत्य भी अटल है कि – काम करोगे, तब अपने आप मिल जाएगा। अपने कर्तव्य को निष्ठा के साथ निभाने से पुरस्कार-प्राप्ति भी अटल है। वास्तविक पहचान दी नहीं जाती बल्कि ईमानदारी से योगदान करके सेवा-संतुष्टि का मीठा फल अर्जित किया जा सकता है।”

विधिक कार्य विभाग के सचिव के अपने कार्यकाल में मैंने राष्ट्रीय कर्मयोगी जन सेवा कार्यक्रम के फेज़-I और फेज़-II 20 बैचों में 100% की सर्वोच्च उपस्थिति के साथ सफलतापूर्वक पूरे कराए जो क्षमता विकास की हमारी यात्रा में अब तक का एक बड़ा मील पत्थर है। प्रत्येक अधिकारी, कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारी और हमारे एमटीएस के सहकर्मी साथ-साथ इस कार्यक्रम में शामिल हुए क्योंकि इसमें सीखने की दृष्टि से न कोई कनिष्ठ और न ही सुनने में कोई वरिष्ठ था।

हमने सीखा कि प्रगति के लिए सदैव केवल कागजी कार्रवाई आवश्यक नहीं होती और पद केवल संस्कृति विकसित नहीं कर सकते। विधिक कार्य विभाग में हर सप्ताह मैं ग्रुप हैड्स के साथ चल रहे कार्यों की स्थिति जानने के लिए चाय पर अनौपचारिक चर्चा आयोजित करती थी। ये सरल, मानवीय प्रयास थे और इनके परिणाम आश्चर्यचकित कर देने वाले रहे। विभिन्न विषयों पर खुले मन से विचार-विनिमय होता था। इसमें पदों को कोई प्रमुखता नहीं मिलती। प्रमुखता मिलती थी तो भविष्य की अंतर्दृष्टि को।

हमारे विभागीय संस्कृति में सुधार लाने में हर महीने होने वाली टिफिन बैठक भी काफी महत्वपूर्ण रहीं। ये बैठकें हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अभिप्रेरणा का ही सुफल थी। यह बैठक आरंभ में विधि सचिव के साथ अनौपचारिक रूप से लंच के समय में होती थी जो बाद में एक दूसरे से सीखने और मिलकर समस्या का समाधान करने का एक प्रभावी मंच बन गई। एक दूसरे के साथ भोजन साझा करने के साथ-साथ अधिकारियों द्वारा चुनौतियों पर चर्चा, विचार-विनिमय और समस्या-समाधान का एक सशक्त माध्यम बन गई थी जो औपचारिक बैठकों में शायद संभव नहीं हो सकता था।

“हमारे विभाग में सीखना स्वैच्छिक था न कि किसी नियम वश। हमने सभी स्तरों के अधिकारियों की उपलब्धियों को आईगोट प्लेटफॉर्म पर सम्मानित करने की शुरुआत कराई, यह किसी समारोह का हिस्सा नहीं थीं बल्कि व्यक्तिगत स्वीकृति और संवाद के तौर पर प्रस्तुत की जाती थीं। इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि जब कोई अधिकारी कोर्स पूरा करने के पश्चात् यह कहता कि ’मैडम, अब मुझे समझ आया कि हम क्या कर रहे हैं’ – उनके काम और सुशासन के बृहत् उद्देश्य की भावना को समझाने में सफलता ही मिशन कर्मयोगी की सच्ची जीत है।”

अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने विभाग के परिसर में कुछ छोटे किंतु सार्थक ढांचागत परिवर्तन भी किए। बैठक-कक्ष का नाम बदलकर उसे “कर्मयोगी सभागार” का नया नाम दिया गया। प्रशासनिक अनुभागों को माननीय प्रधानमंत्री के चार संकल्प मूल्यों - एकता, विकास, गर्व और कर्तव्य की प्रेरणा से नया नामकरण किया गया। ये केवल साइनबोर्ड मात्र नहीं थे बल्कि इस बात को रोजाना दोहराना था कि हम क्या हैं और हमारी सेवा के क्या मायने हैं।

मेरा मानना है कि क्षमता विकास केवल एक कैलेंडर कार्यक्रम ही नहीं है अपितु एक रिले दौड़ है। इसमें हममें से प्रत्येक को अपने हिस्से की दौड़ पूरी करनी है पर यह भी याद रखना है कि यह बैटन केवल कुछ समय के लिए ही हमारे पास है और इस दौरान हम कितना निष्ठा के साथ दौड़ते हैं वही यह तय करेगा कि हम अपने अगले साथी को क्या सौंप रहे हैं। हमारे पास जो बैटन है वह हमारी जिम्मेदारी मात्र नहीं है बल्कि यह सेवा - भाव है।

हम भविष्य की ओर देखें तो हमारा लक्ष्य अपने कार्यालयों को केवल कार्य-स्थल मात्र नहीं रहने देना है बल्कि इन्हें नवोन्मेषन, परानुभूति और उत्कृष्टता का जीता - जागता क्लासरूम बना देना है जिसमें ज्ञान का खुले मन से प्रसार हो, जिज्ञासा का उत्साहवर्धन हो, प्रतिक्रया का स्वागत हो और लोक - सेवक के रूप में संतुष्टि सफलता का सर्वोच्च मापदंड हो।

मेरे लिए सुधार का सच्चा अर्थ है:
परिवर्तन का शोर नहीं, मूक दूरगामी परिवर्तन।
केवल अनुपालन नहीं, दृढ़-विश्वास।
सम्मान नहीं, संतुष्टि।